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फर्क…बेगमों का शहर भोपाल और नवाबों का शहर लखनऊ में

बेगमों के शहर से निकले और नवाबों के शहर में आ टपके। कोई पूछ सकता है- क्या फर्क है दोनों शहरों में? कोई फर्क है भी या नहीं? आखिर दोनों ही गाय बेल्ट…हिंदी बेल्ट…गोबर बेल्ट…अपनी आस्था मुताबिक जो दिल चाहे मान लीजिए। हां…तो दोनों ही शहर दो प्रदेशों की राजधानियां हैं। 

लंबाई-चौड़ाई देखे तो थोड़ा ऊपर-नीचे लगाकर करीब-करीब एक से हैं। सवाल फिर वही कि फर्क क्या है? 

तो जनाब फर्क है भी और नहीं भी। फर्क है क्योंकि मौसम से लेकर लोगों का मिजाज सब अलग है।

मौसम कुछ ऐसा है कि बिना कूलर, एसी के चंद सेकेंड खड़े रह गए तो लिख कर लीजिए पसीने का स्नान कर लीजिएगा। आद्रता का आलम यह है कि बात बेहयाई तक पहुंच गई है। 

नहाने के बाद कपड़े पहनने तक में एक दफे और आप पसीने से स्नान कर चुके होते हैं।

उधर एक मौसम है बेगमों के शहर का। दो से तीन महीने कायदे की गर्मी पड़ जाती है। फिर कायदे से बरसात भी हो जाती हैं। 

यहां…भाई साहब नवाबों के शहर में कुछ भी कायदा नहीं है। ना मौसम में ना लोगों में। गर्मी के मारे बरसात आपके माथे से टपकता मिलता है। वहीं, बरसात कभी सोनभद्र में अटका मिलता है तो कभी ललितपुर में। 

मौसम के बाद अब बात लोगों की। एक मिसाल से मामला समझिए। एक शॉपिंग मॉल के गेट पर गार्ड और उस गेट के आगे ऑटो लगाए ऑटोवाले दोनों में इस बात पर बहस हो जाती है कि…

सुनो! तुम ज्यादा लाटसाहबी ना झाड़ों यहां, गार्ड का वर्दी पहन लिए हो तो!

तुमसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, ऑटो चला रहे तो का हुआ!

ये तो बात हुई मौसम और मिजाज के फर्क की। फिर कुछ ऐसा भी है, जहां फर्क नहीं है।

फर्क नहीं है बात जब एक अकेली लड़की के अकेले रहने पर आती है तो सब बात ढाक के तीन पात है। 

क्या बेगमों का शहर और क्या नवाबों का शहर। कोई फर्क है नहीं है बहन। 

अच्छा…आपको अकेले रहना है?

हां जी!

चलिए देखते हैं…! और फिर शांत हो जाते हैं। फिर बड़ी दबी जुबान में मनाही करते हैं। 

हम सिंगल लड़कियों को नहीं देते घर। बस आखिरी बार जब बेगमों के शहर भोपाल में घर ढूंढा था तो यही सुना था। 

हां तो…फिर मुद्दे पर आते हैं। फर्क है या नहीं दोनों में? एक बार फिर जवाब है...है भी और नहीं भी।

इन दोनों जवाबों के और भी फेस्तिहत के साथ अगली कड़ी का इंतजार करिए। 


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Jagriti Rai

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