
अयोध्या राम की, लोग राम के, जन्मस्थान राम का, मर्यादा राम की, सब जयकारे राम के, सब मनुभाव राम का, सब सत्कार राम का। चहु ओर राम। धरती राम, आसमान राम। हवा में राम, पानी में राम। हर तरफ राम ही राम।
राम की अयोध्या। राम का एयरपोर्ट, राम का रेलवे स्टेशन। राम का रेनवे, राम की रेल पटरियां। सड़कों पर राम, सड़क किनारे की दीवारों पर राम। गलियों में राम, चौक-चौराहों पर राम। घर के पूजा घरों में राम, दरवाजों पर राम। दरवाजों पर लटकते बंदरबानों पर राम। हर तरफ राम ही राम।
गमछे पर राम, कुर्ते पर राम। भगवा टोपियों पर जय श्री राम। भींची हुई मुट्ठियों में राम। आंखों में दहकते अंगारों में राम। मुख से निकलते उन्मादी नारों में राम। भक्ति की जगह रोष में राम। करुणा की जगह वीर रस में सने राम। हर तरफ राम ही राम।
राजनीति में राम, चुनावों में राम। नेताओं के तकियाकलाम भए राम। छुटभैया नेताओं के आदर्श राम। जन में पैठ बनाने के राह राम। बैर फैलाने के साधन राम, शांति की दुहाई का नाम राम। लोकतंत्र में राजतंत्र वाले राम। हर तरफ राम ही राम।
बस नहीं हैं कहीं तो वाल्मिकी के राम, तुलसीदास के राम। वो विमलसुरी के राम। दशरथ जातक वाले राम। उत्तर के राम से बेखबर दक्षिण के राम। अब के राम के गर्दिश में खो गए हैं तब के राम।
खोने से याद आया कि खो गए हैं 'सिया के राम'। खो गया है 'जय सिया राम' और 'सीता-राम'। खो गया है राम का स्त्रीत्व। खो गया है सीता का अस्तित्व। बचे हैं तो हर तरफ बस राम ही राम। पत्थरों और चित्रों में उभरे विराट, विशाल और अकेले खड़े राम।
खो गए हैं सबरी के राम। गुम हो चुके हैं केवट के राम। कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आते सुग्रीव के राम। मात्र पत्थरों तक सिमट कर रह गए हैं अहिल्या के राम। कोई तो ढूंढ कर ला दो सिया के राम।
वो राम जिनकी आंखों में प्रेम है। वो राम जिनकी छवि में मर्यादा और करुणा है। वो राम जिनकी पोशाक में ठहराव है। वो राम जिनकी बाल छवि पर निहाल हैं माएं। वो राम जिनके यौवन पर न्यौछावर है हर रुप। वो राम, जिनकी है मधुर मुस्कान।
वो प्रेम गीत वाले राम। श्रद्धा के धुन के श्रृंगार राम। दूर दृष्टि लिए राम। सद्भभाव और समभाव ओढ़ने वाले राम। सिया के प्रेमी राम। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के आदर्श राम। कौशल्या के दुलारे राम और कैकयी के प्यारे राम।
अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, रोष, उन्माद और प्रासाद…ये नहीं हैं मेरे राम के आदर्श और श्रृंगार। चीखती आवाजें। भाषाणों का शोर। आरोप-प्रत्यारोप। लांछनों का दौर। ये नहीं है मेरे राम की नीयत।
पहले राम कण-कण में थे। अब वो सिर्फ अयोध्या में रहेंगे। पहले राम जन-जन में थे। अब वो सिर्फ अयोध्या जाने वालों के मन में रहेंगे। पहले हर मन में राम की अपनी मूरत थी। अब राम एक पत्थर की मूरत में रहेंगे।
राम आ रहे हैं। राम तथाकथित जन्मस्थान पर बिराज रहे हैं लेकिन बहुत कुछ कीमत पर। धर्म और राजनीति के खतरनाक घोल की कीमत पर। ध्रुवीकरण की कीमत पर। वैमनस्यता की कीमत पर और मन तक फैली दरारों की कीमत पर।











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