
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥
यह रामचरितमानस के उत्तरकांड में एक चौपाई है। इस चौपाई की ही दूसरी लाइन को लेकर अब विवाद छिड़ा हुआ है। 11 जनवरी को सबसे पहले बिहार के शिक्षामंत्री चंद्रशेखर ने इस चौपाई को कोट करते हुए इसे तथाकथित नीची जाति के लोगों का अपमान करने वाला बताया। मीडिया में इस बयान के आते ही बयान देेने वालों की चेन एक्टिवेट हो गई। फिर क्या था! एसपी नेता स्वामी प्रसाद मौर्या का भी इस पर बयान आ गया। उन्होंने भी इसे दलित और शुद्र विरोधी बताया। इसकी प्रतिक्रिया में तमाम चोंगा धारी साधु-संतों का बयान आना भी स्वाभाविक था। लेकिन यहां मेरा इरादा इन बातों के बीच किसी किनारे को पकड़ना नहीं है। ना ही इन बयानों वाले भंवर में फंसना है। मेरा इरादा रामचरित मानस, रामायण जैसी रचनाओं और उनके पात्रों की परिधि की थाह लेना है। सामान्य मानविकी के जहन में ये इतनी गहराई तक क्यों बसे हैं, उसकी पड़ताल करना है।
करीब 2500 सालों से दोहराएं जा रहे हैं राम और कृष्ण
रामचरित मानस को लेकर इस पूरे विवाद की शुरुआत फिलहाल लोक में विमर्श का विषय बना हुआ है। तो सबसे पहले बात लोक मानस में ऐसे धार्मिक साहित्य की छाप से ही करते हैं। यहां मुझे राम मनोहर लोहिया के निबंध राम, कृष्ण शिव की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं। लोहिया की ये बातें आज के परिपेक्ष्य में भी प्रासंगिक बनी हुई हैं। वे कहते हैं कि हिंदुस्तान की किंवदंतियों ने सदियों से लोगों के दिमाग पर निरंतर असर डाला है। इतिहास के बड़े लोगों के बारे में, चाहे वे बुद्ध हों या अशोक, देश के चौथाई से अधिक लोग अनभिज्ञ हैं। दस में एक को उनके काम के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी होगी और सौ में से एक या हजार में एक उनके कर्म और विचार के बारे में कुछ विस्तार से जानता हो तो अचरज की बात होगी। देश के तीन सबसे पौराणिक नाम- राम, कृष्ण और शिव सबको मालूम है।
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की ऐतिहासिकता के सवाल पर वो कहते हैं “इनको इतिहास के परदे पर उतारने की कोशिश करना और ऐसी कोशिश होती भी है, तो एक हास्यास्पद चीज होगी। संभावनाओं की साधारण कसौटी पर इनकी जीवन कहानी को कसना उचित नहीं। सत्य का इससे अधिक आभास क्या मिल सकता है कि पचास या शायद सौ शताब्दियों से भारत की हर पीढ़ी के दिमाग पर इनकी कहानी लिखी हुई है। इनकी कहानियां लगातार दोहराई गई हैं। बड़े कवियों ने अपनी प्रतिभा से इनका परिष्कार किया है और निखारा है तथा लाखों-करोड़ों लोगों के दुख इनमें घुले हुए हैें।"
भारत की लोक परंपराओं में राम और कृष्ण की जीवटता
बिहार की मधुबनी पेंटिंग। ये पेंटिंग क्या है यहां यह बताने की जरूरत नहीं। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पेंटिंग की थीम पूरी तरह महाकाव्यों पर आधारित होती है। राम और कृष्ण जैसे पात्र इस पेंटिंग की आत्मा में बसते हैं। इस पेंटिंग की शुरुआत के पीछे वजह ही सीता विवाह को बताया जाता है। रामायण में इसका शुरूआती जिक्र बताया जाता है। इसके मुताबिक मिथिला के राजा जनक ने सीता की शादी के समय चित्रकारों को मधुबनी चित्र बनाने का आदेश दिया था। इसी तरह उड़िसा की प्रसिद्ध पट्टचित्र की बात करें तो इसका भी थीम जगन्नाथ और वैष्णव संप्रदाय से जुड़ा हुआ है। कभी-कभी शिव और शक्ति को भी जगह दी जाती है। इसी तरह बात बंगाल के पटुआ आर्ट की करें या कलकक्ता के कालीघाट पेंटिंग की। बात आंध्र प्रदेश की कमलकारी पेंटिंग की हो या तेलंगाना की चेरियल स्क्रोल पेंटिंग की। ये सभी चित्रकलाएं अलग-अलग हैं। इन्हें बनाने की तकनीक अलग है। इनमें रंगों की बुनावट अलग है। पर एक बात है जो इन सबको एक धागे में पिरोती है- वो है इनका मजमून यानी थीम। यानी राम, कृष्ण, शिव और शाक्त।
महाकाव्य भारतीय नृत्य शैलियों की आत्मा में बसते हैं
रामायण, महाभारत और पुराण जैसे महाकाव्य आज की आधुनिक सभ्यता में इस कदर घुले-मिले हैं कि हंस का नीर क्षीर विवेक भी इसे अलग कर सकता है या नहीं। कह पाना मुश्किल है। इन नृत्य शैलियों से अगर इन महाकाव्यों की बुनावट को निकाल दिया जाए, तो इनका अस्तित्व तक नहीं बचेगा। फर्ज करिए कि कथक नृत्य से रास लीला को निकाल दिया जाए। इसका नतीजा होगा कि कथक, कथक रह ही नहीं जाएगा। पूरे नृत्य का आधार ही कृष्ण की रास लीला होती है। इसी तरह केरल का कथककली का आधार है रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की कहानियां। वहीं, आंध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी को पुराणों की गाथाओं से अलग नहीं किया जा सकता है। यही बात मोहिनीअट्टम, ओड़िसी, मनीपुरी और सात्रिया जैसी नृत्य कलाओं पर लागू होती हैं।
भारत में हर राज्य की अपनी एक नृत्य विधा है। और ये सभी नृत्य कलाएं कहीं ना कहीं अपनी बुनावट की जड़े भारत के महाकाव्यों में पाती हैं। महाकाव्यों और मिथकिय चरित्रों से नृत्य कला का समागम यहीं नहीं रुकता है। इन नृत्य कलाओं के अलावा भारत में हर राज्य के हर क्षेत्र से लेकर कस्बे तक के अपने लोक नृत्य और संगीत होते हैं। और इनमें भी राम, कृष्ण, शिव सहित तमाम मिथकिय चरित्रों के अंश मिल जाते हैं।
हर साहित्य एक देश, काल और परिस्थिति में लिखा जाता है
रामायण हो या उससे 16 वीं शताब्दी में अवधी जैसे क्षेत्रिय भाषा में निकला रामचरित मानस। या इसके अवाला भी आज के समय में महाकाव्य का दर्जा लिए तमाम साहित्य। इन सबका किसी भी संदर्भ में व्याख्या करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि ये साहित्य एक काल विशेष और परिस्थिति विशेष में लिखे गए थे। उन परिस्थितियों और उस समय की व्याख्या इतिहासकार भी तमाम किंतु और परंतु जैसे शब्दों के साथ करते हैं। ऐसे में, आज के समय में उसे वर्तमान के संदर्भों में गलत या सही के कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता है। अपनी प्रजाति पर इतना भरोसा किया जा सकता है कि इन साहित्यों का मूल्यांकन इनके समय ने जरूर किया होगा।
और जहां तक बात इनके अभी तक मानस पटल पर अंकित रहने की है, तो आखिर में एक बार फिर राम मनोहर लोहिया की बात याद आती है। वो कहते हैं, “किंवदंतियां एक तरह से महाकाव्य और कथा, कहानी और उपन्यास, नाटक और कविता की मिली-जुली उपज हैं। किंवदंतियों में अपरिमित शक्ति है और ये अपनी कौम के दिमाग का अंश बन जाती हैं।” किंवदंतियों को लेकर चेताते हुए वे कहते हैं कि इनमें अशिक्षित लोगों को भी सुसंस्कृत करने की ताकत होती है। लेकिन उनमें सड़ा देने की क्षमता भी होती है।











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