फर्क…बेगमों का शहर भोपाल और नवाबों का शहर लखनऊ में
बेगमों के शहर से निकले और नवाबों के शहर में आ टपके। कोई पूछ सकता है- क्या फर्क है दोनों शहरों में? कोई फर्क है भी या नहीं?


बेगमों के शहर से निकले और नवाबों के शहर में आ टपके। कोई पूछ सकता है- क्या फर्क है दोनों शहरों में? कोई फर्क है भी या नहीं?



अयोध्या राम की, लोग राम के, जन्मस्थान राम का, मर्यादा राम की, सब जयकारे राम के, सब मनुभाव राम का, सब सत्कार राम का। चहु ओर राम। धरती राम, आसमान राम। हवा में राम, पानी में राम। हर तरफ राम ही राम।



तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य नाम के ‘महान’ राजा हुए। उनके युद्ध कौशल से लेकर कुटनीति की आज भी चर्चा होती है। लेकिन जिन साक्ष्यों के हवाले से उनके गुण-दोष का महिमामंडन किया जाता है, उन्हीं से यह भी पता चलता है कि उनकी तीन पत्नियां थीं। लेकिन चंद्रगुप्त के बरक्स उनकी जिंदगी कैसी थी, वो अपने समय को कैसे देखती थीं? इसका ब्योरा समय के किसी पड़ाव पर दर्ज नहीं हुआ।



याद करिए आखिरी बार फूलों की खुशबू से आप कब मचल पड़े थे। आखिरी बार कब ऐसा हुआ था जब किसी फूल की खुशबू की खुमारी के पीछे चल पड़े हों। आखिरी बार कब था जब किसी सड़क, गली या पगडंडी से गुजरते हुए एक भीनी सी फूलों की खुशबू आपको अंदर तक भिगो गई हो। याद करना मुश्किल हो रहा होगा। खासकर तब और मुश्किल हो रहा होगा, जब किसी गांव या छोटे कस्बे में गए उम्र के कुछ पड़ाव निकल गए हों।



साल की शुरुआत में हमने और आपने अपने-अपने हिस्से के रेजोल्यूशन लिए। पर लोकतंत्र का क्या! वो बेचारा क्या करें? उसने तो सालों पहले जो रेजोल्यूशन लिया था वो साल दर साल टूट रहा है। जब धूमधाम से दुनियाभर में गले लगाया गया था तब कहा गया कि अब सब कुशल मंगल होगा। देशों के रखरखाव की इस व्यवस्था को सब विकल्पों में सबसे उत्तम बताया गया। और इसके पीछे वजहें भी वाजिब थी। लेकिन फिर वक्त बीता। दशक बीते। सदी बीती। फिर आया 21 वीं सदी। उसमें भी 2010 के बाद के साल। या गिनती के हिसाब से उसके बाद का दशक कहा जा सकता है। साल 2020 आते-आते देश से लेकर विदेशी मीडिया में लोकतंत्र विशेषज्ञों के हवाले से ओपीनियन कॉलम लिखे जाने लगे कि दुनियाभर में दक्षिणपंथ का उभार खतारनाक रूप से हो रहा है। चेतावनी जारी होने लगी कि यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि, ये डर का माहौल बिना वजह नहीं था। और इसकी तस्दीक कर रही है पिछले साल और इस साल की शुरुआत की घटनाएं।



हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥



शादी। ये शब्द सुनते ही इस देश में हर इंसान के अनुभवों के पिटारे से कोई ना कोई आपबीती सामने आ ही जाती है। लेकिन आज बात अनुभवों पर नहीं बल्कि इनके साथ नत्थी एक परंपरा पर। और उसके साथ प्रचलित व्याख्याओं पर।



हर शहर में कुछ स्थाई बशिंदे होते हैं। तमाम वजहों से पलायनवादी होते जा रहे इस युग में भी वो शहरों में बस ठहर से गए होते हैं। हालांकि, उनकी उम्र भी इतनी नहीं होती कि जगहों की यात्राओं में वो खुद को डालें। प्रवृति तो उनकी कतई ऐसी नहीं होती। उन्हीं बशिंदों में से एक हैं मच्छर और मक्खियां। खैर आज बात सिर्फ मच्छरों की। मक्खियों की देशभक्ति की गाथा आजादी के इस अमृत महोत्सव पर कभी और!



बचपन से हम सब एक विषय के रूप में इतिहास को पढ़ते आए हैं। किताबों में दी गई तारीखों को रट लिया, ऐतिहासिक घटनाएं पढ़ ली और परीक्षा होने तक उन्हें जी-जान से याद भी रखा। लेकिन इतिहास को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। हर विषय का अपना इतिहास है। चाहे वह गणित हो, विज्ञान हो, राजनीति हो या कोई और क्षेत्र। फिर सवाल उठता है कि आखिर इतिहास क्या है? लिखा क्यों गया है? और लिखा भी गया तो यह कैसे तय किया गया कि कौन सी घटना लिखनी है और कौन सी नहीं?



भारत में पर्दा प्रथा की शुरुआत कब हुई इस पर खूब चर्चा होती है. दोष कभी मु्स्लिम आक्रांताओं के साथ नत्थी किया जाता है तो कभी पूरी बहस को तमाम कालखंडों में स्त्रियों की दशा की तरफ मोड़ दिया जाता है. लेकिन इस प्रथा के अब तक चलन में रहने और खत्म करने की जोर आजमाइश पर बात अब कम ही होती है. या यूं कहें कि बात जहां पहुंचनी चाहिए यह बात वहां होती ही नहीं है. और बात विचार जहां है वहां पैमाना ही यही होता है कि आप उस प्रथा के शिकार या शिकारी नहीं हैं.
