इस आजाद देश में कैद ज़ेहनियत की निशानी है ‘कनिया देखने’ की रस्म

भारत में पर्दा प्रथा की शुरुआत कब हुई इस पर खूब चर्चा होती है. दोष कभी मु्स्लिम आक्रांताओं के साथ नत्थी किया जाता है तो कभी पूरी बहस को तमाम कालखंडों में स्त्रियों की दशा की तरफ मोड़ दिया जाता है. लेकिन इस प्रथा के अब तक चलन में रहने और खत्म करने की जोर आजमाइश पर बात अब कम ही होती है. या यूं कहें कि बात जहां पहुंचनी चाहिए यह बात वहां होती ही नहीं है. और बात विचार जहां है वहां पैमाना ही यही होता है कि आप उस प्रथा के शिकार या शिकारी नहीं हैं.

भारत में इस तरह की सामाजिक कुरीतियों को आंकना हो तो गांव और शहरों के लिए पैमाना भी अलग-अलग बनाना होगा. क्योंकि जाहिर तौर पर पर्दा प्रथा इस देश के शहरों में उतना बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है. इसके पीछे बड़ी साफ सामाजिक और आर्थिक वजहें देखी जा सकती हैं. लेकिन यहीं फॉर्मूला इस देश के दूर दराज के गांवों में लागू नहीं होता. वहां ना समाज के स्तर पर कोई क्रांति हुई है ना ही अर्थ के समीकरण बदले हैं. बात औरतों की करें तो जो इन तमाम बंधनों से इत्तेफाक नहीं रखती वो कब का आजाद होकर अपनी-अपनी उड़ान पर हैं.

खैर यहां ये भूमिका इसलिए बांधी गई है क्योंकि बिना प्रस्तावना के आगे की कहानी पूरी नहीं की जा सकती थी. तो हुआ यूं कि साल की शुरुआत में गांव जाना हुआ. बाकी काम के साथ एक काम मां की जिद पर पड़ोस में ‘कनिया’ देखने जाना भी था. पूर्वांचल में ‘कनिया’ उन दुल्हनों को कहा जाता है जो नई-नई शादी करके आई हो. और ‘देखना’ इसलिए क्योंकि घर में आई नई सदस्य को आज भी गांवों में परिचय कराने का मतलब सिर्फ देखने तक सीमित होता है. खैर हम ‘कनिया देखने’ पहुंचे. घर के बाकी सदस्यों से बातचीत के बाद हमें एक कमरे में ले जाया गया. वहां घूंघट निकाले दुल्हन जमीन पर बिछी चटाई पर बैठी हुई थी.  

ऐसा नहीं है कि यह होते हुए मैं पहली बार देख रही थी. पांचवी कक्षा तक मेरी पढ़ाई गांव में हुई. इसलिए यादों के पिटारे में आज भी गांव की ज्यादातर बातें दर्ज हैं. उन्हीं कुछ यादों में से एक ये भी है. होली की शाम में शहर से लेकर गांव तक में मिलने जुलने की परंपरा हैं. पर मेरे जहन में होली से जुड़ी यादों में कनिया देखने का रिवाज भी जुड़ा हुआ है. होता दरअसल यह था कि पिछले कुछ महीनों में जितनी भी नई शादियां हुई रहती होली की शाम गांव की लड़कियां उन घरों में जाती और नई ब्याह कर आई उन बहुओं को देखती. यहां देखने से मतलब सिर्फ देखने से ही है. सामने बैठी नई दुल्हन की आंखें तक बंद रहती ताकी वो औरों को ना देख पाए. आस पड़ोस की उन दीदीयों के साथ खलते कूदते मैं भी घर-घर कनिया देखती.

बचपन में इस रिवाज के धागे में पितृसत्ता के सड़े रेशों को देख पाना मुश्किल था. लेकिन इतने बाद सालों बाद आंखों के सामने जब यह सब कुछ घटा तो जहन में हजार सवाल एक साथ उठ खड़े हो गए. सालों बाद भी बहू के परिचय कराने का वहीं तरीका देख जैसे अंदर तक कुछ खटक गया।

लेकिन गांव और वहां के लोगों के लिए इस 21वीं में ये अब भी आम बात है. शादी कर नए घर में लड़की का अपने आस-पास से परिचय कराने का यह तरीका सिर्फ मेरे गांव तक सीमित हो ऐसा नहीं है. यह यूपी बिहार के ज्यादातर हिस्सों में एक जरूरी रस्म है. 

यहां यह भी जानना जरूरी है कि शादी के बाद आई दुल्हन को घर परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ऐसे परिचित नहीं कराया जाता. यहां अन्य सदस्य से भी मतलब सिर्फ घर की महिलाओं तक सीमित है. क्योंकि उम्र में बड़े घर के पुरुष सदस्यों को घर आई इन नई दुल्हनों का नाम पता हो और उनके पक्ष से लेन-देन की रकम पता हो यही काफी है. 

वहीं, बात जब बाहर या आस-पड़ोस के लोगों की आती है तो दुल्हन को एक नुमाइश की चीज की तरह रख दिया जाता है. दरअसल उस समय एक स्त्री को यह एहसास दिलाया जा रहा होता है कि तुम किससे मिलोगी, किन लोगों से बात करोगी, तुम्हारा सामाजिक व्यवहार का दायरा कितना होगा. यह सब हो रहा होता है एक आजाद देश में. एक लोकतांत्रिक देश में. लिंग के नाम पर भेदभाव ना करने की हिदायत देते संविधान के राज में. याद रहे यह देश आजाद है, इस देश की औरतें अब भी नहीं. इसके बाद भी इन रस्मों में किसी को अगर मगर की गुंजाइश दिखती है तो माफ करिए लेकिन यह देश तो आजाद हो गया लेकिन आपकी सोच पितृसत्ता के पिंजरे में अब भी कैद है.


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Jagriti Rai

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