यूपी, गारी गीत और मेरे कुछ सवाल, जवाब का एक सिरा स्मृति और दूसरा सिरा भिखारी ठाकुर

शादी। ये शब्द सुनते ही इस देश में हर इंसान के अनुभवों के पिटारे से कोई ना कोई आपबीती सामने आ ही जाती है। लेकिन आज बात अनुभवों पर नहीं बल्कि इनके साथ नत्थी एक परंपरा पर। और उसके साथ प्रचलित व्याख्याओं पर। 

यूपी उसमें भी पूर्वांचल में शादी के मौके पर कन्या पक्ष की तरफ से वर पक्ष को ‘गारी’ (गाली के लिए आंचलिक शब्द) देने की परंपरा है। कितने सालों से चली आ रही है? कब तक बनी रहेगी? इन सवालों का जवाब दे पाना मुश्किल है। लेकिन ये बात पक्की है कि ये रस्म आज भी उतनी ही शिद्दत और मनोभाव से निभाई जाती है। और गालियां भी ऐसी वैसी नही। वो लयमय होती हैं। उनमें एक संगीत होता है। मुखड़ा और अंतरा होता है। ढोलक की थाप और घुंघरू की झनकार होती है। पर शब्द ऐसे की कोई बाहर गांव का इंसान इन्हें बिना परंपरा वाले संदर्भ के साथ सुन ले तो एक बार को झई (चक्कर) आ जाए। आपा तक खो दे इसकी भरपूर गुंजाइश है। लेकिन जो जानते हैं उनके लिए ये मात्र एक परंपरा है, एक रस्म है। 

शादियां, गारी गीत और मेरे सवाल

चीजों को देखकर जबसे सब जान लेने की चेतना हुई, तब से इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश की। घर का विज्ञान और बाहर का समाजशास्त्र समझने वालों से भी इसका जवाब जानने की कोशिश की। लेकिन कभी कोई पुख्ता जवाब नहीं मिला। हां, समाजशास्त्रियों का वर्जन माने तो इसके पीछे वर पक्ष की सहनशीलता मापना है। कहते हैं जिस घर में लड़की विदा की जा रही हो उस घर के लोग बातों की चोट को कितनी सहजता से लेते हैं, ये इन गालियों से परखा जाता है। उसमें भी ये जिम्मेदारी कन्या पक्ष की महिलाओं की होती है। लेकिन मेरे लिए ये वर्जन कामचलाऊ था। हर बात में अतीत के धागे को कहीं दूर नत्थी करने वाला मन इस थ्योरी से पूरी तरह कभी सहमत नहीं हो पाया। 

ए एस अल्तेकर की किताब

इस बीच एक किताब हाथ में आई। हाथ में इसलिए क्योंकि दराज में वो कई महीनों से पड़ी थी। अनंत सदाशिव अल्तेकर की पोजिशन ऑफ वुमन इन हिंदू सिविलाइजेशन। यूनिवर्सिटी में इसे टूकड़ों में पढ़ी थी। उतना, जितना सेमेस्टर के सिलेबस के लिए काफी था। लेकिन दिली इच्छा थी पूरा पढ़ने की। अपने जमापूंजी में शामिल करने की। किताब तसल्ली से हिंदू समाज में औरत की दशा और दिशा की बात करती है। शुरुआत वैदिक काल से करते हुए फिल-वक्त तक लाती है। सारी व्याख्याएं तब के मौजूद सबूतों के सहारे होती हैं। किताब के दूसरे चैप्टर में औरतों की शादी और तलाक का जिक्र है। कितनी तरह की शादियां होती हैं, इस सवाल के जवाब के लिए वो स्मृतियों में उतरते हैं। और इन्हीं जवाबों में से वो शादियों में गायी जाने वाली गालियों की एक ठोस वजह सतह पर लाते हैं। 

शादियां कितनी तरह की होती हैं और एक जवाब

हिंदू समाज में ऋग्वैदिक समय से ही 8 तरह की शादियां होती थी। इस तथ्य पर अब तक कई लिखित स्त्रोतों के सहारे ज्यादातर इतिहासकार एक पन्ने पर हैं। मतलब सहमत हैं। इसमें ब्रह्म, दैव, प्रजापत्य, अर्ष, गंधर्व, पिशाच, असुर और राक्षस है। इन आठों में से राक्षस तरह के विवाह के बारे में अल्तेकर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि युद्ध में जीते हुए विजेता, पराजित पक्ष की औरतों को उपहार में ले जाते थे। सीधे शब्दों में यह शादियां युद्ध जीतने के बाद उसका इनाम हुआ करती थी। इस सौदे में पराजित पक्ष की औरतों की शादी विजेता पक्ष के पुरुषों से कराई जाती थी। इस तरह की शादी की प्राचीनता को अल्तेकर पाषाणकाल तक ले जाते हैं। तब इसे ‘क्षत्र विवाह’ नाम से जाना जाता था। 

ऋग्वेद के विमद और महाभारत के भीष्म का जिक्र करते हैं। इनके माध्यम से युद्ध में जीत के बदले शादियों का जिक्र करते हैं। भीष्म ने काशी के राजा को हराया और उनकी बेटी अंबा को अपने साथ लाए। अंबा को साथ लाने की वजह अपने भाई विचित्रवीर्य से शादी कराने का जिक्र अल्तेकर करते हैं। अल्तेकर की माने तो बाद में ऐसी शादियों से युद्ध और हथियार तो हट गए लेकिन इन शादियों की परंपरा बरकरार रही। 

यहीं पर अल्तेकर उत्तर प्रदेश और गुजरात में आज भी दुल्हन की विदाई के समय गाई जाने वाली गालियों का जिक्र करते हैं। कहते हैं कि आज भी इन पारंपरिक गीतों में वर पक्ष को चोर-डाकू कहकर संबोधित किया जाता है। हालांकि अब ये गालियां गीतों के रूप में उदार हैं। लेकिन मुमकिन है कि जब युद्ध के बाद औरतों को जीत के उपहार के रूप में ले जाया जाता होगा तो ये गालियां अपने असल अर्थों में होती होंगी। अल्तेकर की माने तो इतनी भारी भरकम गालियां सिर्फ किसी बुरी आत्मा को नवविवाहित से दूर रखने के लिए तो नहीं दी जाती होंगी। इनमें कई ऐसे गीत है जहां साफ शब्दों में वर पक्ष को किसी हमलावर की तरह कन्या जीत कर ले जाते हुए संबोधित किया गया है। 

भिखरी ठाकुर, गारी गीत और अल्तेकर

भोजपुरी भाषी हैं और भिखारी ठाकुर के नाम से अनजान हैं तो मसान वाले पंकज त्रिपाठी की आवाज में ये कहावत आपके लिए ही है कि ‘मनुष्य योनी में पैदा होने का पूर्णतः फायदा नहीं उठाया है’। खैर यहां मुझे याद उनकी एक गीत की आ रही है। उसके बोल कुछ यूं हैं- 

चलनी के चालल दुलहा, सूप के फटकारल हे,

दिअका के लागल बर, दुआरे बाजा बाजल हे।

आँवा के पाकल दुलहा, झाँवा के झारल हे;

कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे।

सासु का अँखिया में अन्हवट बा छावल हे;

आइ कs देखऽ बर के पान चभुलावल हेsss।

आम लेखा पाकल दुलहा, गाँव के निकालल हे;

अइसन बकलोल बर चटक देवा का भावल हे।

मउरी लगावल दुलहा, जामा पहिरावल हे;

कहत ‘भिखारी’ हवन राम के बनावल हे।

इस गीत में साफ तौर पर दुल्हें को जितना हो सके नीचा दिखाने की कोशिश की गई है। बॉडी शेमिंग से लेकर रंग भेद इसमें सब है। अल्तेकर की कही बातों के संदर्श में देखा जाए तो ये बिल्कुल वैसा ही गारी गीत है। मेरे अनुभव में यह उन गारी गीतों का मोडेरेट वर्जन भी है जो मैं अपने गांव की शादियों में सुनती आई हूं। गारी गाने की रस्म को लेकर ये जानना मेरे लिए आसमान में तारों को मिलकर एक तस्वीर बनाने जैसा अनुभव भी है। वो तस्वीर जो मेरे सारे सवालों के तो नहीं, लेकिन इस रस्म से जुड़े एक बड़े हिस्से का जवाब है।

चंदन तिवारी की आवाज में भिखारी ठाकुर के गाने का लिंक- https://www.youtube.com/watch?v=VkmpLO7zNuk

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Jagriti Rai

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