लोकतंत्र का न्यू ईयर रेजोल्यूशन!

साल की शुरुआत में हमने और आपने अपने-अपने हिस्से के रेजोल्यूशन लिए। पर लोकतंत्र का क्या! वो बेचारा क्या करें? उसने तो सालों पहले जो रेजोल्यूशन लिया था वो साल दर साल टूट रहा है। जब धूमधाम से दुनियाभर में गले लगाया गया था तब कहा गया कि अब सब कुशल मंगल होगा। देशों के रखरखाव की इस व्यवस्था को सब विकल्पों में सबसे उत्तम बताया गया। और इसके पीछे वजहें भी वाजिब थी। लेकिन फिर वक्त बीता। दशक बीते। सदी बीती। फिर आया 21 वीं सदी। उसमें भी 2010 के बाद के साल। या गिनती के हिसाब से उसके बाद का दशक कहा जा सकता है। साल 2020 आते-आते देश से लेकर विदेशी मीडिया में लोकतंत्र विशेषज्ञों के हवाले से ओपीनियन कॉलम लिखे जाने लगे कि दुनियाभर में दक्षिणपंथ का उभार खतारनाक रूप से हो रहा है। चेतावनी जारी होने लगी कि यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि, ये डर का माहौल बिना वजह नहीं था। और इसकी तस्दीक कर रही है पिछले साल और इस साल की शुरुआत की घटनाएं। 

साभार: सीएनएन

बात सबसे पहले ताजी घटना की। तो हुआ यों कि एक देश में एक व्यक्ति के समर्थन का खुमार कुछ लोगों पर यूं चढ़ा कि वो देश के पार्लियामेंट पर चढ़ गए। सुप्रीम कोर्ट का नामो-निशा मिटा देने पर उतारू हो गए। राष्ट्रपति भवन को सच्चे अर्थों में लोक के बहके हुए तंत्र से रूबरू करा दिया गया। 

जब ब्राजील से ये खबरें और तस्वीरें दुनियाभर ने देखी तो अनायास ही लोगों को पिछले साल की शुरुआत याद आ गई। दरअसल जनवरी 2021 में ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के समर्थकों की तरह ही पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने वाशिंगटन डीसी में कैपिटल हिल पर धावा बोल दिया था। यह दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के लिए शर्म की तरह देखा गया। आखिर क्या वजह रही कि इतने समय से जिस तंत्र में लोग रहते आ रहे हैं। दुनियाभर में जिसकी मिशालें देकर खुद को सबसे ऊंचे पायदान पर रखते हैं, वहीं के लोग सिर्फ एक व्यक्ति के कहने पर पूरे राष्ट्रपति चुनाव को मानने से इंकार कर देते हैं।

साभार: सीएनएन

लोकतंत्र में इस हालात के लिए वजहें तलाशना हो तो थोड़ी भारी भरकम बात करनी होगी। लेकिन ये इतनी भी भारी नहीं हैं। अगर किसी नेता या बाबा-सोखा जैसों की बातों के भार से आपका बुद्धि-विवेक नहीं दबा है, तो इन्हें समझना मुश्किल नहीं है। 

युवाल नोआह हरारी। इनके लिए शाहरुख का वो डायलॉग फिट बैठता है कि नाम तो सुना ही होगा। तो हरारी अपने एक इंटरव्यू में डेमोक्रेसी के इस हालत पर कहते हैं कि आज के समय में लोकतंत्र के ऊपर खतरे की बड़ी वजह है तकनीक। वो कहते हैं कि तकनीक की वजह से इतिहास में पहली बार ये मुमकिन हो पाया है कि कोई अगर चाहे तो हर समय हर व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रख सकता है। ऐसा ना सोवियत यूनियन के समय हो पाया था ना ही नाजी जर्मनी में। लेकिन फिलहाल ये मुमकिन है।

दूसरी वजह बताते हैं कि ये भी इतिहास में पहली बार मुमकिन हो पाया है कि मेरे बारे में कोई बाहरी सिस्टम मुझसे भी अच्छी तरह जानता है। उसके जानने का हद ये है कि वो मुझे मुझसे भी बेहतर ढंग से समझता है। यह एक बहुत बड़ा खतरा है। उदाहरण के लिए स्टालिन मुझे मुझसे बेहतर ढंग से नहीं जान सकता था। लेकिन फिलहाल ये मुमकिन है। 

साभार: सीएनएन

हरारी की इन बातों की तस्दीक के लिए साल 2014 में अमेरिकी चुनाव में फेसबुक की भूमिका की कहानी किसी से अब छिपी नहीं है। यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने यानी ब्रिग्जिट के जनमत संग्रह के समय सोशल मीडिया ने किस तरह इस पर असर डाला, वो बात भी ज्यादा पुरानी नहीं हुई है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव या ब्रिटेन का जनमत संग्रह कुछ भी लोगों का स्वतंत्र चुनाव नहीं था। इसे तकनीक ने प्रभावित किया था। राज्य ने इस तकनीक का इस्तेमाल लोगों के चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए किया था। ये दो मामले तो बस वो हैं जिनके बारे में जहीन लोगों के हाथ सबूत लग गए।

दुनिया के कितने लोकतंत्र में आज देश के मुखिया से लेकर गांव तक के मुखिया का चुनाव निष्पक्ष रह गया है, यह बता पाना मुश्किल है। पर ऐसा नहीं है कि लोगों में अपना नेता चुनने को लेकर तकनीक के आने से पहले कोई पक्षपात नहीं था। वह था। लेकिन तब कोई एक बाहरी कारक दूसरे पक्ष को हमारी नजरों से, हमारी सोच से, हमारे विवेक से, हमारे तर्कों और नाप तौल से ओझल नहीं कर सकता था। लेकिन टेक्नोलॉजी के माध्यम से आज यह मुमकिन हो पाया है। अब यह मुमकिन हो पाता है कि एक नेता या एक पक्ष से ही इंसान सोने से लेकर जगने तक घिरा रहे। उसके सामने सिक्के के दूसरे पहलू की झलक तक नहीं आती। तकनीक उसके दिमाग में पहले से भरी भावनाओं के मुताबिक ही उसे सूचनाएं परोसता है। और इस हद तक उसे भर देता है कि दूसरे पक्ष को देखने या सूनने तक की उसमें जगह नहीं बचती है। 

अगर हर साल इसी तरह लोकतंत्र की चिन्हों पर धावा बोला जाता रहा तो उसे सच में सोचना होगा कि क्या वह खतरों की इस अपडेटेड लिस्ट के लिए तैयार है? क्या इस इंटरनेट और बायो टेक्नोलॉजी के मेल से तैयार कॉकटेल का कोई काट है उसके पास?

स्पष्टीकरण: इस ब्लॉग को जनवरी महीने में पब्लिश हो जाना था। लेकिन मेरे कुछ न्यू ईयर रेजोल्यूशन की वजह से यह एक महीने की देरी से आ रहा है।


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Jagriti Rai

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