आखिर कहां गुम हो गई फूलों की खुशबू?

याद करिए आखिरी बार फूलों की खुशबू से आप कब मचल पड़े थे। आखिरी बार कब ऐसा हुआ था जब किसी फूल की खुशबू की खुमारी के पीछे चल पड़े हों। आखिरी बार कब था जब किसी सड़क, गली या पगडंडी से गुजरते हुए एक भीनी सी फूलों की खुशबू आपको अंदर तक भिगो गई हो। याद करना मुश्किल हो रहा होगा। खासकर तब और मुश्किल हो रहा होगा, जब किसी गांव या छोटे कस्बे में गए उम्र के कुछ पड़ाव निकल गए हों।

मुझे कुछ फूलों के खुशबू तो याद हैं लेकिन उनसे रूबरू हुए कितने साल गुजर गए याद करना मुश्किल हो रहा है। पर अब भी याद है उन फूलों की खुशबू जब-जब वो जहन में भीनी हो। गांव के घर से बाजार जाने के रास्ते में पिंटू भइया का घर था। घर की चारदीवारी से लटकती रातरानी के गुच्छे। जब शाम होती और उस रास्ते से गुजरते तो ऐसा लगता यहीं रुक जाए। 

गुलाब की खुशबू मुझे नानी के गांव ले जाती है। हाल फिलहाल जहां भी गुलाब दिखता है, खुशबू की चाह में उसके पास चली जाती हूं। लेकिन खुशबू गुम होती है। पर नानी गांव के गुलाब कुछ अलग थे। दुआर पर जाने के साथ ही वो भीनापन अपनी ओर बुलाने लगता था। ना जाने शहरों के गुलाब से वो मद्धम सी सुगंध कहां गायब हो गई है। वो भी बस शहरों की तरह देखने में ही चमकीले रह गए हैं। इसी गुलाब की खुशबू का एक हिस्सा गांव भी ले जाता है। तुलसी के बगले दादी के हाथ से लगा लाल गुलाब का पौधा। खूब गझिन होता था। चाहे जितना तोड़ लो दादी कभी मना नहीं करती थी। लेकिन अब ना दादी हैं, ना वो पौधा और ना वो खुशबू। 

गेंदा का फूल देखने भर से जहन में उसकी सुगंध कौंध जाती है। फिर उससे नत्थी यादों की रील दिमाग में घूम पड़ती है। उसमें मौसी की शादी से लेकर दादी के साथ गांव में किसी के हल्दी में जाना हो। या कुछ साल पहले तक दिवाली पर पूजा घर से लेकर घर के हर दरवाजे पर लटकते गेंदा के बंदरबान हो। लेकिन अब उन फूलों के पास जाने पर कोई महक नहीं आती। ऐसा लगता है कि मानो ये फूल बस रंगों की परिपाटी बनाने के लिए रह गए हों। 

बोगनविलिया:बिना सुगंध वाले ही पौधों से मन भरना है तो उसके लिए बोगनविलिया है। खुशबू वाले फूलों को उनकी पहचान से अलग करना उनके साथ नाइंसाफी है।

फूलों की खुशबू कहां गुम हुई? जब इस यक्ष प्रश्न को ढूंढा तो जवाब इंसानों की ज्यादा से ज्यादा फूलों की चाहत पर आकर रुक गया। पता चला कि समय के साथ आबादी बढ़ी। उसके साथ बाजार बढ़ा। उसके साथ बढ़ी लोगों में फूलों की मांग। लेकिन दिक्कत तब आन पड़ी जब ये एहसास हुआ कि सुगंध और सुंदरता एक साथ नहीं चल सकती। अगर दोनों साथ चले तो मांग की दौड़ में कहीं पीछे छूट जाएंगे। फिर रास्ता निकला कि इस दुनिया के हर फूल चाहने वाले तक इन फूलों को पहुंचाना है तो खुशबू की कुर्बानी देनी पड़ेगी। अब उसका नतीजा सामने है। हाइब्रिड बीज से फूलों की बगिया तो आबाद हो गई। पर सुंगधों के पिटारे में अपनी यादों को संजोने वालों के लिए यह शामत जैसे है। 


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Jagriti Rai

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