
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य नाम के ‘महान’ राजा हुए। उनके युद्ध कौशल से लेकर कुटनीति की आज भी चर्चा होती है। लेकिन जिन साक्ष्यों के हवाले से उनके गुण-दोष का महिमामंडन किया जाता है, उन्हीं से यह भी पता चलता है कि उनकी तीन पत्नियां थीं। लेकिन चंद्रगुप्त के बरक्स उनकी जिंदगी कैसी थी, वो अपने समय को कैसे देखती थीं? इसका ब्योरा समय के किसी पड़ाव पर दर्ज नहीं हुआ।
समय के इसी पहिए का अगला पड़ाव है छठी शताब्दी ईसा पूर्व। एक रात एक राजकुमार उठता है फिर अपनी पत्नी और एक अबोध बालक को छोड़कर ज्ञान की तलाश में निकल जाता है। वो राजकुमार आज के गौतम बुद्ध हैं और उनकी पत्नी थीं यशोधरा। उस राजकुमार की मनःस्थिति का रेसा-रेसा आज दुनिया को पता है। उनके विचारों और उपदेशों से लेकर रहने-खाने की बारिकियों को चार महासभा कर दर्ज किया गया। ये अब चार 'बौद्ध संगितियों' के नाम से जानी जाती हैं। जातक कहानियों में उनके जन्म के पहले से लेकर पुर्नजन्म तक की बारीकी बता दी गई। इसके बाद इन ग्रंथों पर कितनी टिप्पणियां लिखी गई उसकी गितनी अब भी जारी है। पर उस रानी ने क्या महसूस किया? यहां से उस रानी ने अपनी जिंदगी को क्या मोड़ दिया? ऐसे किसी सवाल का जवाब आज इतिहास के पास नहीं है।
सीता हों या द्रौपदी या कुमारदेवी या राज्यश्री। इन औरतों का नजरिया अतीत के हिस्से से गायब है। और ये तो सिर्फ चंद नाम हैं। ऐसी ही अनगिनत औरतों की कहानी अपने समय में छूट चुकी हैं। इतिहास की हर घटना पुरुषवादी नजरिए से पुरुषों ने पुरुषों के लिए लिखा। इसका नतीजा अब हमारे सामने है। हम अपने अतीत के एक बड़े हिस्से को सिर्फ एक नजरिए से जानते हैं।
पुनर्जागरण काल भी औरतों के नजरिए से इतिहासलेखन में सोया रहा
इतिहास विषय के दायरे की शुरुआत सिर्फ किसी ‘घटना’ को लिख देने से हुई थी। अपने काल में जो घटनाएं दर्ज होती गईं वो आगे चलकर इतिहास का विषय सामग्री बनीं। पर 14 वीं शताब्दी में पुनर्जागरण ने इस विषय की परिधि को बढ़ाया। दायरा समाज, राजनीति और संस्कृति तक बढ़ा। इन सबके अतीत के बारे में लिखा जाने लगा। लेकिन यह फैला दायरा भी अभी औरतों के हिस्से की कहानियां लिखने में काहिली करता रहा।

दायरा कितना बड़ा होगा। इसकी सीमा कहां तक होगी। अब भी यह पुरुषों की समझ और उनके अनुभव से तय हो रहा था। जर्मन इतिहासकार लियोपोल्ड वॉन रांके और ब्रिटिश इतिहासकार जॉन सीले इतिहास को बस राजनीतिक घटनाओं तक सीमित कर देना चाहते थे।नेबूर का मानना था कि इतिहास में व्यक्ति को महत्व दिया जाना चाहिए। फिर जर्मन इतिहासकार हर्डर थोड़ा उदार हुए और इतिहास का विस्तार भूगोल, जलवायु और पर्यावरण विषयों तक किया।
और जब इतिहासकारों ने अतीत में स्त्री को तलाशना शुरू किया
20 वीं सदी के शुरुआत तक स्त्रियों के नजरिए से अतीत का हर पक्ष अंधेरे में था। पर रोशनी को वहां पहुंचना था। और वो पहुंची और नारीवादी इतिहास लेखन की शुरुआत हुई। अतीत के हर हिस्से को औरतों ने अपने कुचियों से रंगना शुरू किया। पहले छोटी-मोटी पत्र और पत्रिकाओं को निकालने से शुरुआत हुई। फिर इस मुहिम का दूसरा पड़ाव बनी फ्रांसीसी लेखिका साइमन द बोउअर और उनकी किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’। और तीसरा पड़ाव इस 21वीं सदी में कई बीती सदियों को समेटने में लगा है।

पर इतने जतन के बावजूद औरतों का इतिहास लिखने में दुनिया ने देर किया है। और जब शुरू हुआ तो औरतों को अतीत में तलाश पाना सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा। आज जब यशोधरा या कुमारदेवी के नजरिए से उनके वक्त को देखने की कोशिश होती है तो ना ही उनके नाम बड़े-बड़े शिलालेखों पर गुदे मिलते हैं। ना ही किसी दरबारी कवि के हवाले से उनकी दिनचर्या को ब्योरा मिलता है। बुद्ध का समय अब से करीब 2500 साल से भी पहले था। पर बुद्ध की पत्नी ‘यशोधरा’ की मनोदशा 20 वीं शताब्दी में मैथिलीशरण गुप्त नाम के कवि ने लिखी। पर यहां भी विडंबना यह है कि वो एक कविता है। यानी यशोधरा के मन का हाल जानने के लिए आज हमारे पास एक कवि की कल्पना है।
भारत में उमा चक्रवर्ती, उर्वशी बुटालिया और भारतीय राय जैसी इतिहासकार हैं जो इस ऐतिहासिक खाई को पाटने में जुटी हुई हैं। मसलन उमा चक्रवर्ती की किताब ‘जेंडरिंग कास्ट’ हो या ‘रिराइटिंग हिस्ट्री: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ पंडित रमाबाई’। या फिर उर्वशी बुटालिया की भारत-पाकिस्तान विभाजन पर ‘मौन के दूसरी ओर’ हो या ‘वुमन एंड पार्टिशन’। इन किताबों के जरिए ये इतिहासकार उस वक्त में वापस जा रही हैं और उन सभी घटनाओं को एक स्त्री के नजरिए से देखने, परखने और सामने लाने की कोशिश कर रही हैं।

पर इतनी कोशिशों के बाद भी आसान नहीं है इतने कम वक्त में सब लिख दिया जाना और सब जान पाना। लेकिन हमें आज के अपने अनुभवों को लिखना होगा कल के लिए। ताकि कल जब हमारा अतीत तलाशा जाए तो उसके स्त्रोत हम बनें।
नोट: कुमारदेवी गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त द्वितीय की पत्नी हैं। राज्यश्री वर्धन वंश के राजा हर्षवर्धन की बहन थीं।











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