एक शहर...एक वायसराय और मच्छरों के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बनने की कहानी

हर शहर में कुछ स्थाई बशिंदे होते हैं। तमाम वजहों से पलायनवादी होते जा रहे इस युग में भी वो शहरों में बस ठहर से गए होते हैं। हालांकि, उनकी उम्र भी इतनी नहीं होती कि जगहों की यात्राओं में वो खुद को डालें। प्रवृति तो उनकी कतई ऐसी नहीं होती। उन्हीं बशिंदों में से एक हैं मच्छर और मक्खियां। खैर आज बात सिर्फ मच्छरों की। मक्खियों की देशभक्ति की गाथा आजादी के इस अमृत महोत्सव पर कभी और!

यहां जो शहर है वो मेरा शहर है। मतलब लहुरी काशी। मतलब गाजीपुर। इस शहर में मच्छरों को एक विशेष दर्जा दिया गया है। दर्जा है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का। मुल्क को आजाद हुए 75 साल होने जा रहा है। आजादी के इस अमृत महोत्सव पर सरकारों ने अनसंग हिरोज की गाथा दुनिया के सामने लाने के लिए तमाम जतन किए हुए है। इसलिए इस शहर के वीर मच्छरों की कहानी भी कही जानी चाहिए। लेकिन मच्छरों की इस वीरता को जानने के लिए पहले एक अंग्रेज गर्वनर जनरल की कहानी को जानना पड़ेगा। वह गवर्नर जनरल है लार्ड कार्नवालिस। सामान्य ज्ञान की किताबों की भाषा में कहें तो भारत में स्थाई बंदोबस्त की शुरुआत करने वाला एक अंग्रेज, एक वायसराय। 

बारह खंभों पर टिकी इमारत (लार्ड कार्नवालिस का मकबरा)

यह जाहिर है कि अंग्रेज भारत में विदेशी व्यापारी बनकर आए थे। यहां उनके जीने और मरने का कोई इरादा नहीं था। क्राउन का राज आते-आते तो इंग्लैंड में भारत की छवि ही एक ऐसे जगह की तरह बन गई थी, जहां के कार्यकाल में अकूत संपत्ति का अंबार लगाया जा सकता था। आज मौजूद तमाम गवाहों के मद्देजर कह सकते हैं कि लार्ड कार्नावालिस भी मरने के इरादे से तो भारत नहीं आया था। 

पहली बार वो 1789 में गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। 5 साल का एक कार्यकाल पूरा कर 1794 में वह वापस इंग्लैंड भी चला गया। लेकिन गाजीपुर के मच्छरों के किस्मत में कुछ और लिखा था। 1805 में दूसरी जिम्मेदारियों के साथ उसे फिर भारत भेजा गया। वापस आने के कुछ ही दिनों बाद वह बीमार पड़ा और फिर कभी वापस नहीं जा पाया। 

सफेद संगमरमर के इस वर्गाकार चौकी पर लार्ड कार्नवालिस की मूर्ति है। मूर्ति के चारों तरफ दुखी मुद्रा में सिर झुकाए एक ब्राह्मण और एक मुसलमान है। इस चबूरतरे के दूसरी तरफ इसी तरह सिर झुकाए एक यूरोपीय और एक स्थानीय सैनिक की आकृति है। चबूतरे के एक तरफ अंग्रेजी और दूसरी तरफ ऊर्दू में कार्नवालिस की उपलब्धियां अंकित है।

हुआ दरअसल यह कि अपने काम के ही सिलसिले में वह नदी के रास्ते बंगाल से बनारस के लिए निकला। तब ना आज की तरह सड़कें थी ना हाई स्पीड बोट। नतीजा इतनी ही दूरी तय करने में कई दिन लग जाते थे और अक्सर ही महीनों। काफिला पड़ाव डालते हुए एक शहर से दूसरे शहर पहुंचता था। इस बीच रास्ते में लार्ड कार्नवालिस की तबीयत बिगड़ने लगी। गाजीपुर तक आते-आते हालात ज्यादा खराब होने पर शहर में ही उसका इलाज शुरू हुआ। जांच में पता चला लार्ड कार्नवालिस मलेरिया से पीड़ित है। 

वह तब के शासक वर्ग से था इसलिए इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई। लेकिन तब तक मच्छर उसकी किस्मत लिख चुके थे। गाजीपुर के गौसपुर में लार्ड कार्नवालिस ने आखिरी सांस ली। और इस तरह इस शहर के मच्छरों ने इतिहास में खुद को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में दर्ज कराया। इनमें कितने मच्छरों की नागरिकता गाजीपुर की थी इसका तो पता नहीं लेकिन इस शहर के लोगों ने लोकोक्तियों में यहां के मच्छरों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जरूर बना लिया। 

खैर! लार्ड कार्नवालिस हमेशा के लिए इस शहर में ही रह गया। भारत में ब्रिटिश राज में ना जाने कितने अंग्रेज आए और चले गए। पर लार्ड कार्नवालिस इकलौता अंग्रेज है जो यहीं रह गया। वह एकमात्र अंग्रेज है जिसका मकबरा भारत में है। लार्ड कार्नवालिस का मकबरा अब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की प्रोटेक्टेड साइट है और गाजीपुर का ‘विश्व प्रसिद्ध’ पर्यटन स्थल। विश्व प्रसिद्ध इसलिए कि गाजीपुर शहर में ऐतिहासिक के नाम पर मटेरियल रूप में ज्यादा कुछ है नहीं। और एक यह जो मकबरा है हम शहर वालों के लिए फैमिली पिकनिक से लेकर प्रेम के सार्वजनिक इजहार से असहज होने वाले इस देश में प्रेमी जोड़ो के लिए सुरक्षित स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।


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Jagriti Rai

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