क्या है इतिहास का इतिहास?

बचपन से हम सब एक विषय के रूप में इतिहास को पढ़ते आए हैं। किताबों में दी गई तारीखों को रट लिया, ऐतिहासिक घटनाएं पढ़ ली और परीक्षा होने तक उन्हें जी-जान से याद भी रखा। लेकिन इतिहास को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। हर विषय का अपना इतिहास है। चाहे वह गणित हो, विज्ञान हो, राजनीति हो या कोई और क्षेत्र। फिर सवाल उठता है कि आखिर इतिहास क्या है? लिखा क्यों गया है? और लिखा भी गया तो यह कैसे तय किया गया कि कौन सी घटना लिखनी है और कौन सी नहीं?

सहज समझे तो हमारे आस-पास घट रही घटनाएं बीतते समय के साथ अतीत है और अतीत ही तो इतिहास होता है। अब सवाल उठता है कि एक विषय के रूप में किताबों में लिखे इतिहास और बीते समय में आस-पास घटी घटनाओं में फर्क क्या है? आखिर क्यों किताबों में सिर्फ चुनिंदा घटनाओं का जिक्र होता है? दरअसल इन सवालों का जवाब खुद इतिहास शब्द की परिभाषा और इतिहास क्या है इसको तय करने के पैमानों में छुपा है।

तो क्या है इतिहास की परिभाषा

असल में इतिहास तीन शब्दों का मेल है। इति + ह + आस। मतलब है ‘निश्चित रूप से ऐसा हुआ’। अतीत की ऐसी घटनाएं जो निश्चित रूप से घटी और जिनका सबूत हमारे आस-पास आज भी मौजूद हो। इतिहास के लिए अंग्रेजी शब्द ‘हिस्ट्री’ का भी यही मतलब है। अंग्रेजी का शब्द ‘हिस्ट्री’ यूनानी भाषा के ‘हिस्टोरिया’ शब्द से बना है जिसका मतलब है छानबीन करके या खोजबीन करके जो भी जानकारी मिले उसे ही हिस्ट्री कहा जाता है।

इसी शब्द से मिलता-जुलता ‘हिस्टोरिका’ नाम की एक किताब है। इसके लेखक यूनान के ही हेरोडोटस है। इसी को वो पहली किताब माना गया है जिसमें अतीत की घटनाओं की क्रमबद्ध जानकारी दी गई है। यही वो किताब है जो आज भी इतिहास लेखन के तरीके की झंडाबदार बनी हुई है। यही वजह है कि हेरोडोटस को ‘इतिहास का पिता’ भी कहा जाता है। इस तरह इतिहास के दायरे में सिर्फ वहीं घटनाएं और सूचनाएं समा पाती हैं जिनके प्रमाण हमारे पास मौजूद हैं। ऐसी घटनाएं या ऐसी कहानियां जो अपने निशान छोड़ने में नाकाम रहीं या समय ने जिनके अस्तित्व को मिटा दिया वो आज भी इतिहास की परिधि से बाहर हैं।

वो बातें हैं जो किसी घटना को इतिहास में दर्ज किए जाने लायक बना देती हैं

आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) का अस्तित्व लगभग दो लाख वर्ष पहले माना जाता है। भारतीय सभ्यता को मोटे तौर पर पांच हजार साल पुराना माना जाता है। जाहिर है इतने सालों में इंसान और प्रकृति दोनों ने भी कई कारनामें किए होंगे। लेकिन जब हम किताबों में इतिहास पढ़ते हैं तो इतने लंबे काल-खंड में समय-समय पर रहन-सहन से संबंधित और कुछ विशेष घटनाओं का ही जिक्र पाते हैं। तो इसकी पीछे वजह है किसी घटना को इतिहास के दायरे में लाने वाले पैमानें। 

इतिहास की परिभाषा में ही यह साफ कर दिया गया है कि अतीत की किसी भी घटना को इतिहास के दायरे में लाने के लिए साक्ष्यों का होना जरूरी है। अब यह साक्ष्य भी तीन तरह के हैं। इसमें पहला है पुरातात्विक साक्ष्य। दूसरा है लिखित साक्ष्य और तीसरा है विदेशी यात्रियों का लिखा-पढ़ा।

इन तीनों में भी कुछ और परतें हैं जिन पर अतीत को खरा उतरना जरूरी है। जैसे पुरातात्विक साक्ष्य में अवशेष, अभिलेख, स्मारक, सिक्के और मूर्तियां शामिल हैं। इसी तरह साहित्यिक स्त्रोतों में धर्मग्रन्थ और दूसरे ऐतिहासिक ग्रन्थों को शामिल किया जाता है। वहीं विदेशी यात्रियों के विवरण में हेरोडोटस, मेगास्थनीज, डायोनिसियस, प्लीनी, फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग, अलबरूनी और इब्नबतूता जैसे यात्रियों के लिखे को शामिल किया जाता है। 

इतिहास खुद काल-खंड का शिकार है

इन साक्ष्यों के ही आधार पर खुद इतिहास को भी तीन भागों में बांट दिया गया है। इसमें पहला है प्रागैतिहासिक काल। दूसरा है आद्य ऐतिहासिक काल और तीसरा है ऐतिहासिक काल। यहां प्रागैतिहासिक काल उस समय-सीमा को कहा गया है जिसमें हमें किसी भी तरह की लिखावट के सबूत नहीं मिलते हैं। इस समय के सिर्फ पुरातात्विक सबूत मिलते हैं। पाषाण काल उसी प्रागैतिहासिक काल का हिस्सा है, जिसमें आज भी पत्थरों के सहारे इंसानी जिंदगी के तमाम पहलूओं के बिंब गढ़े जाते हैं।

इसके बाद आता है आद्य ऐतिहासिक काल। वह समय जिसके लिखित प्रमाण तो मौजूद है लेकिन हम उसके लिए अब भी निरक्षर हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता इसी आद्य ऐतिहासिक काल में गिना जाता है।

तीसरा और आखिरी है ऐतिहासिक काल। वह समय जिसमें पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ-साथ तमाम आम से लेकर खास तक का लिखा-पढ़ा मौजूद है। इस ऐतिहासिक काल की शुरुआत छठी शताब्ती ईसा पूर्व से माना जाता है। इस तरह अतीत की घटनाओं में कौन सी घटना इतिहास के किताबों में जगह पाएगी, ये पैमाने ही तय करते हैं।

इतिहास लिखा क्यों गया है

इतिहास क्यों लिखा जाता है इसका जवाब खुद इंसान हैं। वह दावा करता है कि चिंतनशीलता उसके ‘सामाजिक’ जानवर होने के दावे को पुष्ट करता है। दावा यह भी है कि जिज्ञासा उसके मूल स्वभाव का हिस्सा है। इसी जिज्ञासा ने उसका ध्यान अतीत की जानकारियों को ओर खींचा। इंसान हमेशा घटनाओं और विचारों को सहेजकर रखने की कोशिशों के लिए जाना जाता है। श्रुति और स्मृति से चली आ रही परंपरा इसका सबूत है। जो सुना गया और उसमें जो याद रह गया उसे एक काल खंड ने लेखनी में बांध दिया। इस तरह जो लिख दिया गया वो आज के लिए इतिहास हो गया। साथ-साथ जो आज लिखा, पढ़ा और कहा जा रहा है वो कल के लिए इतिहास है।


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Jagriti Rai

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